माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की
सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की
जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने
वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी
उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की
सामर्थ्य उसमें आ जाती है। वे सिद्धिदात्री,
सिंह वाहिनी, चतुर्भुजा तथा प्रसन्नवदना हैं। मार्कंडेय पुराण में अणिमा,
महिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व- ये आठ
सिद्धियां बतलाई गई हैं। इन सभी सिद्धियों को देने वाली सिद्धिदात्री मां
हैं। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें अज्ञान, तमस, असंतोष आदि से
निकालकर स्वाध्याय, उद्यम, उत्साह, कर्त्तव्यनिष्ठा की ओर ले जाता है और
नैतिक व चारित्रिक रूप से सबल बनाता है। हमारी तृष्णाओं व वासनाओं को
नियंत्रित करके हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करते हुए
हमें स्वयं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है। देवी पुराण के अनुसार,
भगवान शिव ने इन्हीं शक्तिस्वरूपा देवी जी की उपासना करके सभी सिद्धियां
प्राप्त की थीं, जिसके प्रभाव से शिव जी का स्वरूप अर्द्धनारीश्वर का हो
गया था।
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Tuesday, 23 October 2012
Monday, 22 October 2012
मां का आठवां रूप : महागौरी
मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। मां के इस स्वरूप का
ध्यान हमें आस्था, श्रद्धा व विश्वास रूपी श्वेत प्रकाश को अपने जीवन में
धारण करते हुए अलौकिक कांति व तेज से सुसंपन्न होने का संदेश प्रदान करता
है। मां महागौरी की अवस्था आठ वर्ष की मानी गई है-अष्टवर्षा मवेद गौरी।
इनका वर्ण शंख, चंद्र व कुंद के फूल के समान उज्ज्वल है। इनकी चार
भुजाएं हैं। मां वृषभवाहिनी व शांतिस्वरूपा हैं। नारद पंचरात्र के अनुसार,
शंकर जी की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते हुए मां का शरीर धूल-मि˜ी से
ढककर मलिन हो गया था। जब शंकर जी ने गंगाजल से इनके शरीर को धोया, तब गौरी
जी का शरीर विद्युत के समान गौर हो गया। तब से ये देवी महागौरी के नाम से
विख्यात हुई। उनका ध्यान जीवनपथ में आने वाले अज्ञानजन्य दु:खों व
परिस्थितियों का समूल नाश करके हमें भयमुक्त करता है।
ध्यान मंत्र :
" श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेतांबर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा ॥"
Sunday, 21 October 2012
मां का सातवां स्वरूप : कालरात्रि
मां दुर्गा की सातवीं शक्ति का स्वरूप कालरात्रि का है। उनके शरीर का
रंग अंधकार की तरह काला है। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है।
तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह गोल हैं, जिनसे ज्योति निकलती है। इस स्वरूप का
ध्यान हमारे जीवन के अंधकार से मुकाबला कर उसे प्रकाश की ओर ले जाने के
लिए प्रेरित करता है। उनके श्वास-प्रश्वास से अग्नि की ज्वालाएं निकलती
हैं। मां का ध्यान हमारे भीतर के काम, क्रोध, मद लोभ, मोह और अहंकार जैसे
दुर्गुणों को भस्म कर देता है। मां गर्दभ (गधे) पर सवार हैं। उनका स्वरूप
भले ही भयानक हो, किंतु इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है, क्योंकि ये अच्छे
आचरण वालों का शुभ (कल्याण) ही करती हैं। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान
हमारे भीतर आत्मविश्वास जलाकर हममें कठिनाइयों तथा विपत्तियों से जूझने की
क्षमता प्रदान कर हमारा पथ आलोकित करता है।
ध्यान मंत्र :
"करालरूपा कालाब्जसमाना कृति विग्रहा।
कालरात्रि: शुभं दद्यात् देवी चंडाहासिनी॥"
Saturday, 20 October 2012
मां का छठा स्वरूप : कात्यायनी
मां दुर्गा की छठी शक्ति को कात्यायनी के रूप में जाना जाता है।
कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनके इस स्वरूप का
नाम कात्यायनी पड़ा। कात्यायन ऋषि ने देवी को पुत्री-रूप में पाने के लिए
भगवती की कठोर तपस्या की थी। इसी स्वरूप में मां ने महिषासुर का वध किया
था। सिंह पर आरूढ़ मां के तेजोमय स्वरूप का ध्यान हमारे भीतर स्वाध्याय,
विद्याध्ययन व तपश्चर्या का तेज प्रदान करता है और निर्मलता, उत्साह,
क्रियाशीलता व उदारता जैसे गुणों को निखारने की प्रेरणा देता है। उनके हाथ
में तलवार हमारी मेधा शक्ति को तीक्ष्ण रखने की प्रेरणा देती है, जिसके
द्वारा हम अपने भीतर के दुर्गुणों का वध कर सकते हैं। उनके स्वरूप का ध्यान
करने से हमें असफलताओं व विपत्तियों से लड़ने की शक्ति हासिल होती है। मां
के चरणों में शरणागत होकर हम अपनी जीवनी शक्ति का संवर्धन करते हुए लक्ष्य
की प्राप्ति कर लेते हैं।
ध्यान मंत्र :
"चंद्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहन: |
कात्यायनी शुभं दद्यात् देवी दानवघातिनी॥"
Friday, 19 October 2012
मां का पांचवां स्वरूप : स्कंदमाता
मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति स्कंदमाता हैं। भगवान स्कंद की माता होने
के कारण ही उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। मान्यता है कि सूर्यमंडल की
अधिष्ठात्री देवी होने के कारण उनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में
प्रकाशमान होती है। इनका वर्ण पूर्णत: शुभ्र है। जिस प्रकार सारे रंग मिलकर
शुभ्र [श्वेत] रंग बनता है, इसी तरह इनका ध्यान जीवन में हर प्रकार की
परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने भीतर आत्मबल का तेज उत्पन्न करने की
प्रेरणा देता है। भगवान स्कंद बाल रूप में इन देवी के गोद में बैठे हैं,
इसलिए ये देवी ममता की मूर्ति हैं और प्रेरणा देती हैं कि मन के कोमल भावों
की शक्ति को भी अपने अंदर बढ़ाना चाहिए। मां सिंह पर पद्मासन में विराजमान
हैं। यह स्वरूप हमें आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। मां का शुभ्र वर्ण इस
बात का द्योतक है कि हमें अहंकार, लोभ व जड़ता को छोड़कर आात्मोत्थान के
लिए सतत प्रयासरत रहना है।
ध्यान मंत्र
"सिंहासनगता नित्य पद्मश्रिकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥"
Thursday, 18 October 2012
मां का चौथा स्वरूप : कूष्मांडा
मां दुर्गा के चौथे स्वरूप को कूष्मांडा देवी कहते हैं। उनका सूर्य के
समान तेजस्वित स्वरूप व उनकी आठ भुजाएं हमें कर्मयोगी जीवन अपनाकर तेज
अर्जित करने की प्रेरणा देती हैं। उनकी मधुर मुस्कान हमारी जीवनी शक्ति का
संवर्धन करते हुए हमें हंसते हुए कठिन से कठिन मार्ग पर चलकर सफलता पाने को
प्रेरित करती है। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें आत्मिक प्रकाश प्रदान
करते हुए हमारी प्रज्ञा शक्ति को जाग्रत करके हमारी मेधा को उचित तथा
श्रेष्ठ कार्यो में प्रवृत्त करता है।
मान्यता है कि मां अपनी हंसी से संपूर्ण ब्रह्मांड को उत्पन्न करती हैं
और सूर्यमंडल के भीतर निवास करती हैं। सूर्य के समान दैदीप्यमान इनकी कांति
व प्रभा है। आठ भुजाएं होने के कारण ये अष्टभुजा देवी के नाम से विख्यात
हैं। मान्यता के अनुसार, उन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है, इसलिए भी ये
कूष्मांडा देवी के नाम से विख्यात हैं।
ध्यान मंत्र
"सुरा संपूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दघानां हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥"
Wednesday, 17 October 2012
मां का तृतीय रूप : चंद्रघंटा
आज तृतीया एवं चतुर्थी एक साथ है, इस कारण आज देवी के तीसरे स्वरूप
चंद्रघंटा और चौथे स्वरूप कूष्मांडा की एक साथ उपासना की जानी चाहिए।
मां दुर्गा की तीसरी शक्ति मां चंद्रघंटा हैं। उनके इस स्वरूप का ध्यान
हमें अपनी दुर्बलताओं से साहसपूर्वक लड़ते हुए उन पर विजय प्राप्त करने की
शिक्षा देता है। मां का यह स्वरूप दस भुजाओं वाला है, जिनसे वे असुरों से
युद्ध करने जाने के लिए उद्यत हैं। वे हमें दस इंद्रियों को नियंत्रण में
रखते हुए ध्येय की प्राप्ति में लगे रहने की शिक्षा प्रदान करती हैं। उनके
ध्यान से हमें आत्मशोधन करने की शक्ति प्राप्त होती है।
मां के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्रमा सुशोभित है। इसीलिए
इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। मां स्वर्ण के समान संपूर्ण ब्रह्मांड
में आलोकित होती हैं। अपने दसों हाथों में अनेक अस्त्र-शस्त्र लिए हुए मां
सिंह पर आरूढ़ हैं। इनकी चंद्र-ध्वनि से सभी दुष्ट दैत्य व राक्षस आदि
भयभीत होकर भाग जाते हैं।
ध्यान मंत्र
"अंडज प्रवरारूढ़ा चंद्र कोपार्भटीयुता।
प्रसादं तनुतां महनं चंद्रघंटेति विश्रुता॥"
मां का द्वितीय रूप : ब्रह्मचारिणी
मां दुर्गा की द्वितीय शक्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। ब्रह्म में लीन होकर
तप करने के कारण इन महाशक्ति को ब्रह्मचारिणी की संज्ञा मिली है। इसीलिए
मां के इस स्वरूप का ध्यान हमारी शक्तियों को जाग्रत करके स्वयं पर
नियंत्रण करने की सामर्थ्य प्रदान करता है। हममें कठिनाइयों से लड़ने व
संघर्ष करने की क्षमता विकसित होती है। मां का ज्योतिर्मयी स्वरूप
अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं व दुर्बलताओं का शमन कर सत्प्रवृत्तियों का
अभिवर्धन करता है। हमारे अंदर दिव्यता, श्रेष्ठता तथा आदर्शवादिता की
अभिवृद्धि करता है। उनके दाहिने हाथ में जप की माला तथा बाएं हाथ में कमंडल
रहता है। मान्यता है कि पूर्वजन्म में वे हिमालय की पुत्री थीं। भगवान
शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने कठोर तप किया। और
तपश्चारिणी कहलाई।
ध्यान मंत्र
"दधानां कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलम्।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त मा॥"
Tuesday, 16 October 2012
मां का प्रथम स्वरूप : शैलपुत्री
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्म्रणव महात्मना।।
नवरात्र का शुभारंभ मां शैलपुत्री की उपासना व ध्यान से किया जाता है।
मां के प्रथम स्वरूप का ध्यान हमें दिव्य-चेतना का बोध कराता है। उनका
श्वेत स्वरूप हमें पतित-कलुषित जीवन से मुक्ति प्रदान करते हुए पवित्र जीवन
जीने की कला सिखाता है। मां का दैदीप्यमान मुखमंडल हमें सृजनात्मक कार्यो
में प्रवृत्त कर शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक आलोक की ओर अग्रसर करता है।
मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल हमारे त्रितापों [दैहिक, दैविक व भौतिक ताप]
का नाश करके कठिन संघर्षो में भी आशा व विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा
प्रदान करता है। बाएं हाथ में कमल का पुष्प हमें काम, क्रोध, मद, लोभ जैसे
पंक रूपी दुर्गुणों से उबारकर उत्कृष्टतम जीवनशैली अपनाने का संदेश प्रदान
करता है। मां वृषभ पर आरूढ़ हैं। वृषभ अर्थात धर्म। कर्तव्यों को पूरा करना
ही हमारा धर्म है, मां हमें यह बोध कराती हैं।
मां शैलपुत्री गिरिराज हिमवान की पुत्री हैं। मान्यता है कि अपने
पूर्वजन्म में ये दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं। इनका विवाह भगवान शिव
से हुआ। दक्ष ने एक यज्ञ के आयोजन में शिव जी को आमंत्रित नहीं किया। इस
अपमान से क्षुब्ध होकर सती ने योगाग्नि द्वारा उस रूप को भस्म कर दिया। वही
सती अगले जन्म में हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के रूप में जन्मीं। इन्हें
पार्वती के नाम से भी जाना जाता है, जो शंकर जी की अद्र्धागिनी बनीं।
ध्यान मंत्र :
" वंदे वांछित लाभाम चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्॥"
Monday, 15 October 2012
देवी पूजन का पर्व है : नवरात्री
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता।।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
महाशक्ति की आराधना का पर्व है नवरात्री। तीन हिंदू देवियों- पार्वती,
लक्ष्मी और सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित है,
जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। पहले तीन दिन पार्वती के तीन
स्वरूपों की अगले तीन दिन लक्ष्मी माता के स्वरूपों और आखिरी के तीन दिन
सरस्वती माता के स्वरूपों की पूजा करते है।
दुर्गा सप्तशती के अन्तर्गत देव दानव युद्ध का विस्तृत वर्णन है। इसमें
देवी भगवती और मां पार्वती ने किस प्रकार से देवताओं के साम्राज्य को
स्थापित करने के लिए तीनों लोकों में उत्पात मचाने वाले महादानवों से लोहा
लिया इसका वर्णन आता है। यही कारण है कि आज सारे भारत में हर जगह दुर्गा
यानि नवदुर्गाओं के मन्दिर स्थापित हैं।
साल में दो बार अश्रि्वन और चैत्र मास में नौ दिन के लिए उत्तर से
दक्षिण भारत में नवरात्र उत्सव का माहौल होता है। इन दिनों में संपूर्ण
दुर्गा सप्तशती का अगर पाठ न भी कर सकें तो निम्नलिखित श्लोकों को पढ़ने से
संपूर्ण दुर्गा सप्तशती और नवदुर्गाओं के पूजन का फल प्राप्त हो जाता है।
सर्वमंगलमंगलये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोऽतु ते।।
शरणांगतदीन आर्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणि नमोऽस्तु ते।।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यारत्नाहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।
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